देश के युवाओं को रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण देने के लिए शुरू की गई केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ताज़ा ऑडिट रिपोर्ट ने योजना के क्रियान्वयन में व्यापक स्तर पर फर्जीवाड़े, तकनीकी खामियों और निगरानी की कमजोरी को उजागर किया है।
अब कैग की रिपोर्ट सामने आने के बाद यह सवाल उठाये जा रहे हैं कि जब हज़ारों करोड़ रुपये खर्च कर करोड़ों युवाओं को कौशल देने का दावा किया जाता है, तब फर्जी अकाउंट, डुप्लीकेट फोटो और बंद केंद्रों पर भुगतान कैसे होता रहा? कैग की रिपोर्ट ने सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जवाबदेही की गहरी कमी की ओर भी इशारा किया है।
लेकिन सवाल यह है कि सरकार और सरकार के नौकरशाह जवाबदेही लेने को तैयार हैं? और हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई क्या हो रही है यह दिखना भी चाहिए। याद रहे मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान इसी कैग की रिपोर्ट को आधार मानकर बड़ा आंदोलन किया गया था और कहा गया था कि सरकार ने कई करोड़ का घोटाला कॉमनवेल्थ गेम में किया है। बीजेपी ने इसका भरपूर लाभ उठाया और अपने तंत्र के जरिये गांव-गांव तक यह पहुंचा दिया कि मनमोहन सिंह की सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त है और यह सरकार देश को बेच देगी।
2014 के चुनाव में जनता ने कांग्रेस को रसातल में पहुंचा दिया। बीजेपी की सरकार बनी और मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन हो गए। बाद में जब इस मामले की सुनवाई मुंबई में हो रही थी तब तत्कालीन कैग प्रमुख ने अदालत को बताया कि ”कॉमनवेल्थ गेम में कोई घोटाला नहीं हुआ था। उन्होंने तो केवल मजाक में ऐसी बातें कह दी थी। हमें इस पर शर्म है और हम माफ़ी भी मांगते हैं। ”
लेकिन अब मोदी राज के कैग ने मोदी सरकार की योजनाओं को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। हालाँकि अभी रिपोर्ट में इस बात की कोई चर्चा नहीं है कि कितने हजार करोड़ का यह घपला किया गया है लेकिन यह तो बता ही दिया गया है कि इस योजना को चलाने वालों ने क्या-क्या खेल किया है। और जाहिर सी बात है कि जो खेल हुए हैं उनमें करोड़ों मकई चोरी ही की गई होगी।
अब निगाहें संसद और सरकार की आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं। संसद और सरकार आगे क्या कुछ करेगी यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन इतना तो साफ़ हो गया है कि मौजूदा सरकार में सब कुछ ठीक चलने का दावा किया जाएगा और कहा जाएगा कि सब कुछ ठीक ही चल रहा है। इसकी बानगी भी सामने आ गयी है। इन खुलासों पर केंद्रीय कौशल विकास मंत्रालय ने कहा कि शुरुआती चरणों में चुनौतियाँ थीं, लेकिन अब सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं। मंत्रालय के अनुसार, स्किल इंडिया डिजिटल हब के तहत अब आधार-प्रमाणित ई -केवाईसी, फेस-ऑथेंटिकेशन और जियो-टैग्ड लाइव अटेंडेंस को अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि आगे ऐसी गड़बड़ियाँ न हों।
दरअसल कहानी यह है कि कैग ने 2015 से 2022 के बीच लागू प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना यानी पीएमकेवीवाई के तीन चरणों का ऑडिट किया। रिपोर्ट के अनुसार, स्किल इंडिया पोर्टल पर दर्ज 95.90 लाख प्रतिभागियों में से 94.53% मामलों में बैंक विवरण या तो खाली थे या ‘Null’, ‘N/A’, ‘शून्य’ जैसी प्रविष्टियाँ थीं। जिन 5.24 लाख खातों का विवरण उपलब्ध था, उनमें भी कई बैंक अकाउंट नंबर ‘11111111111’, ‘123456…’, ‘ABCDE’ या विशेष चिन्हों के रूप में दर्ज पाए गए।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह रहा कि 12,122 यूनिक बैंक खाता नंबरों का इस्तेमाल 52,381 अलग-अलग लाभार्थियों के लिए किया गया—जो सीधे तौर पर फर्जीवाड़े की ओर इशारा करता है। ऑडिट में यह भी सामने आया कि उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और राजस्थान में अलग-अलग लाभार्थियों की प्रोफाइल में एक ही फोटो का बार-बार इस्तेमाल किया गया। इससे कागज़ों पर ‘भूतिया लाभार्थी’ बनाकर सरकारी फंड के दुरुपयोग की आशंका गहराती है।
कैग की टीम ने जब प्रशिक्षण केंद्रों का भौतिक निरीक्षण किया, तो कई राज्यों में केंद्र वास्तव में बंद मिले, जबकि पोर्टल पर उसी दिन ट्रेनिंग बैच चलने का दावा था। बिहार के बांका जिले का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि निरीक्षण के दिन केंद्र पर ताला लटका था, जबकि रिकॉर्ड में दो बैचों की ट्रेनिंग दिखाई जा रही थी।
योजना के दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रत्येक प्रमाणित उम्मीदवार को डीबीटी के जरिए 500 रुपये का प्रोत्साहन भुगतान अनिवार्य था। लेकिन अक्टूबर 2024 तक के आंकड़ों के मुताबिक, 95.91 लाख प्रमाणित उम्मीदवारों में से केवल 61.14 लाख को ही भुगतान मिल पाया। इसका अर्थ है कि 34 लाख से अधिक युवा आज भी अपने हक के पैसे से वंचित हैं, जबकि योजना के सभी चरण पूरे हो चुके हैं।
इसके साथ ही लाभार्थियों की वास्तविकता जांचने के लिए कैग ने एक ऑनलाइन सर्वे किया। नतीजे बेहद निराशाजनक रहे। इनमें 36.51% ईमेल डिलीवर ही नहीं हो सके क्योंकि पते फर्जी या गलत थे। जिन तक ईमेल पहुँचा, उनमें से केवल 3.95% (171 उम्मीदवार) ने जवाब दिया। इन 171 प्रतिक्रियाओं में से 131 ईमेल खुद प्रशिक्षण केंद्रों या पार्टनर्स की आईडी से आईं। यह संकेत देता है कि लाभार्थियों का डेटा सिर्फ फाइलें भरने के लिए तैयार किया गया था।
108 पन्नों की रिपोर्ट में कैग का निष्कर्ष है कि सरकार की इस महती योजना में बेरोज़गार युवाओं/ड्रॉपआउट्स की पहचान, ऑनबोर्डिंग और सत्यापन की संरचित प्रणाली का अभाव पाया गया है और कैग ने साफ़ कर दिया है कि प्रशिक्षकों, असेसरों और लाभार्थियों के डिजिटल पहचान/कॉन्टैक्ट के लिए डेटा रिटेंशन पॉलिसी नहीं, जिससे आईटी नियंत्रण कमजोर पड़े हैं।
मुद्दे की बात तो यह है कि यह सब एक ऐसी सरकार के भीतर संभव हो पाया है जो खुद को पाक साफ़ कहती रही है। बड़ी बात तो यह है कि इस सरकार में बहुत कम ही कैग की रिपोर्ट सामने आती है और आती भी होगी तो मीडिया में कोई चर्चा नहीं की जाती। याद रहे इस योजना का बजट करीब 15 हजार करोड़ का था। अभी यह साफ़ नहीं हुआ है कि फर्जी काम दिखाकर कितने हजार करोड़ रुपये की चपत देश को लगाई है। कई लोग यह सवाल करने लगे हैं कि हजारों करोड़ की राशि वाली इस योजना को चलाने वाले लोगों की जांच की जाए तो कई चौंकाने वाले सच भी सामने आ सकते हैं। उनमें कई राजनीतिक पार्टी से जुड़े हो सकते हैं और कई बीजेपी जैसी पार्टी को चंदा देती भी नजर आ सकती हैं।
(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)